सुबोध सिंह APP न्यूज क्राइम रिपोर्टर, बांका बिहार
गौरीपुर पहाड़ में छिपा इतिहास का खजाना, संरक्षण नहीं हुआ तो मिट सकती है हजारों साल की धरोहर
बांका जिले के शंभूगंज प्रखंड स्थित गौरीपुर पहाड़ एक बार फिर अपने पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व को लेकर सुर्खियों में है। पहाड़ की विशेष पाषाण चट्टानों, गुफाओं और रहस्यमयी अवशेषों का अवलोकन करने के लिए तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के एसएम कॉलेज से इतिहास विभाग के प्राध्यापक डॉ. हिमांशु शेखर, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग के शोधार्थी पवन कुमार यादव तथा जीव विज्ञान शिक्षक सह जिला पर्यावरण विशेषज्ञ व भारतीय रेडक्रास सोसायटी बांका जिला इकाई प्रबंध समिति सदस्य डॉ. प्रवीण कुमार प्रणव यहां पहुंचे। विशेषज्ञों ने निरीक्षण के बाद इस स्थल को अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर बताते हुए इसके संरक्षण की पुरजोर मांग की।
डॉ. हिमांशु शेखर ने ‘टुनटुनियां’ नामक विशाल पत्थर को क्षेत्र का सबसे बड़ा ऐतिहासिक पत्थर करार दिया। उन्होंने कहा कि इसकी संरचना, आकार और स्थिति यह संकेत देती है कि यह स्थल अत्यंत प्राचीन सभ्यता का साक्षी रहा है। पहाड़ की पाषाण चट्टानों पर अंकित लिपियों और प्राकृतिक गुफाओं का अवलोकन करते हुए उन्होंने बताया कि आदिकाल से यहां मानव निवास रहा होगा। चट्टानों की बनावट और गुफाओं की संरचना यह दर्शाती है कि हजारों वर्ष पूर्व लोग इसे तपस्थली के रूप में भी उपयोग करते रहे होंगे।
गौरीपुर पहाड़ बेलहर और शंभूगंज का सीमावर्ती क्षेत्र है, जहां स्थित बाबा गौरीश्वर नाथ महादेव मंदिर की महिमा अपरंपार मानी जाती है। मंदिर और पहाड़ के आसपास प्राचीन मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को प्रमाणित करते हैं। पर्वत की चोटी पर स्थित एक प्राचीन कुआं विशेष आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दिनों में इस कुएं का पानी दूधिया रंग का हो जाता है, जिसे श्रद्धालु दैवीय संकेत मानते हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण कुमार प्रणव ने कहा कि पर्वत की चोटी पर स्थित चट्टान, मंदिर और कुआं हजारों वर्ष पुराने प्रतीत होते हैं। कुएं के ऊपर स्थित विशाल चट्टान और आसपास के प्राचीन वृक्ष इस स्थान की ऐतिहासिकता को और मजबूत करते हैं। उन्होंने बताया कि स्थानीय समाज इस धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन बिना सरकारी सहयोग के इसे संरक्षित करना कठिन होगा।
शोधार्थी पवन कुमार यादव ने सुझाव दिया कि यदि इस क्षेत्र का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और पुरातात्विक अध्ययन कराया जाए तो कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य सामने आ सकते हैं। उन्होंने राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग से तत्काल पहल करने की मांग की। गौरीपुर पहाड़ न केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र इतिहास और पुरातत्व के शोध के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यदि समय रहते संरक्षण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल धरोहर उपेक्षा की भेंट चढ़ सकती है।




