सूरजकांत ब्यूरो रिपोर्ट ,पटना (बिहार)
बांकीपुर उपचुनाव: भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर, प्रशांत किशोर की संभावित एंट्री से मुकाबला रोचक
पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। राज्यसभा के लिए नितिन नवीन के चुने जाने और विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी। अब इस सीट पर होने वाला उपचुनाव बिहार की राजनीति का केंद्र बन गया है। सबसे अधिक चर्चा भारतीय जनता पार्टी के संभावित उम्मीदवार और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के चुनाव मैदान में उतरने की संभावनाओं को लेकर हो रही है।
भाजपा के लिए बांकीपुर सीट केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। पार्टी इस सीट को लंबे समय से अपना मजबूत गढ़ मानती रही है। पिछले लगभग चार दशकों से यहां भाजपा का दबदबा कायम है। नितिन नवीन और उनके पिता ने लंबे समय तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है, जिससे संगठन की जड़ें काफी मजबूत मानी जाती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट पर भाजपा की जीत उसके संगठनात्मक आधार और नेतृत्व की मजबूती का संदेश देगी, जबकि हार विपक्ष के लिए बड़ी राजनीतिक सफलता मानी जाएगी। यही कारण है कि पार्टी उम्मीदवार के चयन को लेकर गंभीर मंथन कर रही है और चुनाव प्रचार में वरिष्ठ नेताओं के लगातार दौरे की भी संभावना जताई जा रही है।
दूसरी ओर, जन सुराज भी इस उपचुनाव को पूरी ताकत से लड़ने की तैयारी में है। यदि प्रशांत किशोर स्वयं चुनाव मैदान में उतरते हैं तो मुकाबला भाजपा और जन सुराज के बीच सीधी प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल सकता है। जन सुराज के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती का दावा है कि बांकीपुर की जनता बदलाव चाहती है और पार्टी स्थानीय समस्याओं को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाएगी।
जन सुराज ट्रैफिक जाम, जलजमाव, सफाई व्यवस्था, पार्किंग की समस्या, रोजगार और शहरी बुनियादी सुविधाओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर मतदाताओं के बीच जाने की तैयारी कर रही है। वहीं भाजपा अपने परंपरागत जनाधार और संगठनात्मक ताकत के भरोसे सीट बचाने की रणनीति पर काम कर रही है।
उपचुनाव की औपचारिक घोषणा के साथ अब सभी की निगाहें प्रमुख दलों के उम्मीदवारों पर टिकी हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि प्रशांत किशोर चुनाव लड़ते हैं तो बांकीपुर का उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं रहेगा, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति और नए राजनीतिक समीकरणों की बड़ी परीक्षा भी बन जाएगा।
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